तिथि क्या है
चंद्रमा सूर्य से 12° और आगे निकल जाए, तो एक तिथि पूरी होती है
Tithi · Thithi · Aaj ki Tithi · Today's Tithi
तिथि पंचांग का चांद्र दिन है। कैलेंडर की तारीख आधी रात को बदलती है, पर तिथि चंद्रमा और सूर्य की चाल से बदलती है। इसलिए तिथि दिन के किसी भी समय बदल सकती है, रात में भी। यह पंचांग के पाँच अंगों में से एक है। बाकी चार अंग हैं वार, नक्षत्र, योग और करण, जो पंचांग की गाइड में समझाए गए हैं।
तिथि कैसे गिनी जाती है?
आसमान में तारों के सामने सूर्य और चंद्रमा दोनों आगे खिसकते रहते हैं, पर चंद्रमा सूर्य से बहुत तेज़ चलता है। अमावस्या जिस क्षण खत्म होती है, उस क्षण दोनों राशि-चक्र पर एक ही डिग्री पर होते हैं, यानी चंद्रमा सूर्य से 0° आगे होता है। इसके बाद चंद्रमा आगे निकलने लगता है और दोनों के बीच का अंतर बढ़ता जाता है। इस अंतर को English में elongation कहते हैं।
यह अंतर हर 12° बढ़ने पर एक तिथि पूरी होती है। पूरा चक्कर 360° का है, और 360 को 12 से भाग दें तो 30 आता है। इसीलिए एक अमावस्या के अंत से अगली अमावस्या के अंत तक ठीक 30 तिथियाँ होती हैं।
नीचे की तालिका में तीसों तिथियाँ क्रम से हैं। तीसरे कॉलम में देखिए कि चंद्रमा सूर्य से कितने डिग्री आगे हो, तब कौन सी तिथि चलती है। जैसे अंतर 120° से 132° के बीच हो, तो शुक्ल एकादशी चलती है।
| क्रम | तिथि | चंद्र − सूर्य |
|---|---|---|
| 1 | शुक्ल प्रतिपदा | 0° – 12° |
| 2 | शुक्ल द्वितीया | 12° – 24° |
| 3 | शुक्ल तृतीया | 24° – 36° |
| 4 | शुक्ल चतुर्थी | 36° – 48° |
| 5 | शुक्ल पंचमी | 48° – 60° |
| 6 | शुक्ल षष्ठी | 60° – 72° |
| 7 | शुक्ल सप्तमी | 72° – 84° |
| 8 | शुक्ल अष्टमी | 84° – 96° |
| 9 | शुक्ल नवमी | 96° – 108° |
| 10 | शुक्ल दशमी | 108° – 120° |
| 11 | शुक्ल एकादशी | 120° – 132° |
| 12 | शुक्ल द्वादशी | 132° – 144° |
| 13 | शुक्ल त्रयोदशी | 144° – 156° |
| 14 | शुक्ल चतुर्दशी | 156° – 168° |
| 15 | पूर्णिमा | 168° – 180° |
| 16 | कृष्ण प्रतिपदा | 180° – 192° |
| 17 | कृष्ण द्वितीया | 192° – 204° |
| 18 | कृष्ण तृतीया | 204° – 216° |
| 19 | कृष्ण चतुर्थी | 216° – 228° |
| 20 | कृष्ण पंचमी | 228° – 240° |
| 21 | कृष्ण षष्ठी | 240° – 252° |
| 22 | कृष्ण सप्तमी | 252° – 264° |
| 23 | कृष्ण अष्टमी | 264° – 276° |
| 24 | कृष्ण नवमी | 276° – 288° |
| 25 | कृष्ण दशमी | 288° – 300° |
| 26 | कृष्ण एकादशी | 300° – 312° |
| 27 | कृष्ण द्वादशी | 312° – 324° |
| 28 | कृष्ण त्रयोदशी | 324° – 336° |
| 29 | कृष्ण चतुर्दशी | 336° – 348° |
| 30 | अमावस्या | 348° – 360° |
शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष क्या हैं?
पहली 15 तिथियाँ, यानी 0° से 180° तक, शुक्ल पक्ष हैं। इन दिनों चंद्रमा का रोशन हिस्सा बढ़ता जाता है। शुक्ल पक्ष की आखिरी तिथि पूर्णिमा है। पूर्णिमा ठीक उस क्षण खत्म होती है जब चंद्रमा सूर्य से 180° आगे होता है। खगोल विज्ञान में यही full moon का क्षण है।
अगली 15 तिथियाँ, यानी 180° से 360° तक, कृष्ण पक्ष हैं। इनमें रोशन हिस्सा घटता जाता है। कृष्ण पक्ष की आखिरी तिथि अमावस्या है, जो तब खत्म होती है जब चंद्रमा फिर सूर्य वाली डिग्री पर आ जाता है। उसी क्षण अगली शुक्ल प्रतिपदा शुरू हो जाती है।
प्रतिपदा से चतुर्दशी तक के नाम दोनों पक्षों में एक जैसे हैं। इसलिए तिथि के साथ पक्ष लिखा जाता है। शुक्ल एकादशी और कृष्ण एकादशी दो अलग तिथियाँ हैं, जो एक-दूसरे से लगभग दो हफ़्ते के अंतर पर आती हैं।
महीने का नाम कब बदले, इसमें परंपराएँ अलग हैं। अमांत पद्धति में महीना अमावस्या पर बदलता है, और पूर्णिमांत पद्धति में पूर्णिमा पर। तिथि का नाम दोनों में एक ही रहता है, सिर्फ़ कृष्ण पक्ष में महीने का नाम अलग पड़ता है। शहरों के पंचांग पन्नों पर मास के नाम के साथ "अमांत" लिखा रहता है। इसका पूरा ब्योरा गणना के तरीके में है।
एक तिथि कितने घंटे की होती है?
तिथि की कोई तय लंबाई नहीं है। 12° का अंतर कितनी देर में बढ़ेगा, यह इस पर निर्भर है कि उस समय चंद्रमा कितनी तेज़ चल रहा है। चंद्रमा की कक्षा पूरी गोल नहीं है। पृथ्वी के पास होने पर वह तेज़ चलता है और दूर होने पर धीमा। सूर्य की आभासी चाल भी साल भर में थोड़ी बदलती रहती है।
2026 की गणना में सबसे छोटी तिथि 20 घंटे 4 मिनट की है। यह 14–15 जून की अमावस्या है। सबसे लंबी तिथि 26 घंटे 43 मिनट की है। यह 11–12 दिसंबर की शुक्ल तृतीया है। दोनों तारीखें भारतीय समय से हैं। यानी एक ही साल में दो तिथियों की लंबाई में 6 घंटे 39 मिनट तक का फ़र्क़ है। भारतीय समय से 2026 में शुरू होकर इसी साल खत्म होने वाली 371 तिथियों का औसत लगभग 23 घंटे 35 मिनट है, यानी एक दिन से थोड़ा कम।
पूरा चांद्र मास भी हर बार बराबर नहीं होता। 2026 में शुरू होने वाले बारह चांद्र मासों को एक अमावस्या के अंत से अगली अमावस्या के अंत तक नापें, तो सबसे छोटा मास 29 दिन 6 घंटे 49 मिनट का है और सबसे लंबा 29 दिन 19 घंटे 33 मिनट का।
इसी वजह से तिथि के खत्म होने का घड़ी-समय रोज़ खिसकता रहता है। जब तिथियाँ 24 घंटे से लंबी चल रही हों, तो अंत-समय हर दिन पिछले दिन से देर में आता है। जब छोटी चल रही हों, तो पहले आता है।
नीचे की तालिका में अभी चल रही तिथि और उसके बाद आने वाली तिथियाँ हैं, भारतीय समय (IST) में। किसी भी पंक्ति में "शुरू" से "समाप्त" तक का समय उस तिथि की लंबाई है। पंक्तियों को मिलाकर देखिए, ये लंबाइयाँ बराबर नहीं मिलेंगी। यह भी देखिए कि हर तिथि का "समाप्त" ठीक अगली तिथि का "शुरू" है। दो तिथियों के बीच कोई खाली समय नहीं होता।
| तिथि | शुरू | समाप्त |
|---|---|---|
| शुक्ल चतुर्दशी | 1:37 PM, 24 अक्टूबर | 11:57 AM, 25 अक्टूबर |
| पूर्णिमा | 11:57 AM, 25 अक्टूबर | 9:42 AM, 26 अक्टूबर |
| कृष्ण प्रतिपदा | 9:42 AM, 26 अक्टूबर | 7:02 AM, 27 अक्टूबर |
| कृष्ण द्वितीया | 7:02 AM, 27 अक्टूबर | 4:07 AM, 28 अक्टूबर |
| कृष्ण तृतीया | 4:07 AM, 28 अक्टूबर | 1:07 AM, 29 अक्टूबर |
| कृष्ण चतुर्थी | 1:07 AM, 29 अक्टूबर | 10:11 PM, 29 अक्टूबर |
| कृष्ण पंचमी | 10:11 PM, 29 अक्टूबर | 7:25 PM, 30 अक्टूबर |
| कृष्ण षष्ठी | 7:25 PM, 30 अक्टूबर | 4:58 PM, 31 अक्टूबर |
| कृष्ण सप्तमी | 4:58 PM, 31 अक्टूबर | 2:52 PM, 1 नवंबर |
| कृष्ण अष्टमी | 2:52 PM, 1 नवंबर | 1:11 PM, 2 नवंबर |
तिथि बदलने का क्षण पूरी पृथ्वी पर एक ही होता है। बस हर देश की घड़ी उसे अलग समय के रूप में पढ़ती है। भारत के बाहर हों, तो यही क्षण अपने शहर की घड़ी के समय में उस शहर के पंचांग पन्ने पर देखिए, जैसे न्यूयॉर्क या लंदन।
आज की तिथि कौन सी है, यह कैसे तय होता है?
पंचांग का दिन आधी रात से नहीं, सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक चलता है। इसलिए किसी दिन की तिथि वह मानी जाती है जो उस शहर में सूर्योदय के समय चल रही हो, चाहे वह सूर्योदय के कुछ मिनट बाद ही खत्म हो जाए। परंपरा में इसे उदया तिथि कहा जाता है। सूर्योदय के बाद शुरू हुई तिथि दिन का ज़्यादातर हिस्सा ले ले, तब भी उस दिन के नाम सूर्योदय वाली तिथि ही लिखी जाती है।
शहर के पंचांग पन्ने पर तिथि के सामने लिखा समय वह क्षण है जब सूर्योदय वाली तिथि खत्म होती है। अगर वह अगले सूर्योदय से पहले खत्म हो जाए, तो उसके नीचे अगली तिथि भी अपने अंत-समय के साथ दिखती है। उदाहरण के लिए दिल्ली, मुंबई या कोलकाता का पंचांग देखिए।
एक बात और। परंपरा में कई व्रत और त्योहार सूर्योदय की जगह दिन के किसी और समय की तिथि से तय होते हैं, जैसे दोपहर या चंद्रोदय के समय की। इन नियमों में क्षेत्र और संप्रदाय के हिसाब से अंतर भी है। इसलिए किसी त्योहार का दिन हमेशा सूर्योदय वाली तिथि से ही मेल खाए, यह ज़रूरी नहीं।
एक ही तारीख को अलग-अलग शहरों में तिथि अलग क्यों हो सकती है?
तिथि बदलने का क्षण हर जगह एक है, पर सूर्योदय हर शहर में अलग समय पर होता है। मान लीजिए कोई तिथि एक शहर के सूर्योदय के बाद, पर दूसरे शहर के सूर्योदय से पहले खत्म होती है। तब उस तारीख को पहले शहर में पुरानी तिथि लिखी जाएगी और दूसरे शहर में नई।
2026 की गणना में कोलकाता का सूर्योदय दिल्ली से 31 से 58 मिनट पहले होता है। साल की 365 तारीखों में से 17 पर इन दोनों शहरों की सूर्योदय वाली तिथि अलग है। मुंबई और दिल्ली में ऐसी तारीखें सिर्फ़ 3 हैं। न्यूयॉर्क और दिल्ली में यह गिनती 153 है, क्योंकि न्यूयॉर्क में किसी तारीख का सूर्योदय दिल्ली में उसी तारीख के सूर्योदय से लगभग 10 घंटे बाद होता है।
इसलिए जब दो पंचांग अपने-अपने शहर के सूर्योदय से गिने गए हों, एक विदेश के शहर का और एक भारत के शहर का, तो कई तारीखों पर उनकी तिथि अलग होना स्वाभाविक है। इसमें कोई गलती नहीं है।
कैलेंडर में तिथि कभी दोहराई या छोड़ी क्यों जाती है?
तिथि की लंबाई दिन के बराबर नहीं होती, इसलिए दो स्थितियाँ बनती हैं।
- एक तिथि, दो सूर्योदय: कोई तिथि एक सूर्योदय से पहले शुरू हो और अगले सूर्योदय के बाद खत्म हो, तो लगातार दो तारीखों पर वही तिथि लिखी जाती है। कैलेंडर में यह तिथि दोहराई हुई दिखती है। परंपरा में इसे वृद्धि तिथि कहते हैं।
- कोई सूर्योदय नहीं: कोई तिथि एक सूर्योदय के बाद शुरू हो और अगले सूर्योदय से पहले ही खत्म हो जाए, तो किसी भी तारीख के नाम वह तिथि नहीं आती। कैलेंडर में वह छूटी हुई दिखती है। इसे क्षय तिथि कहते हैं।
2026 में दिल्ली के सूर्योदय से गिनें तो 17 तिथियाँ किसी भी सूर्योदय पर नहीं पड़तीं, और 11 तिथियाँ दो सूर्योदयों पर पड़ती हैं। दिल्ली में 1 जनवरी 2026 के सूर्योदय से 1 जनवरी 2027 के सूर्योदय तक 365 दिन हैं, पर इस बीच तिथि 371 बार बदलती है। यह 365 में 17 जोड़कर और 11 घटाकर ही आता है। औसत तिथि एक दिन से छोटी है, इसलिए साल भर में छूटने वाली तिथियाँ दोहराई जाने वाली तिथियों से ज़्यादा होती हैं।
कौन सी तिथि छूटेगी या दोहराई जाएगी, यह भी सूर्योदय पर टिका है, इसलिए शहर-शहर में बदलता है। 2026 में कोलकाता में 16 तिथियाँ छूटती हैं और 10 दोहराई जाती हैं। न्यूयॉर्क में 17 छूटती हैं और 10 दोहराई जाती हैं।
क्या तिथि पर ayanamsa का असर पड़ता है?
नहीं। नक्षत्र चंद्रमा की sidereal स्थिति से बनता है, इसलिए उसके लिए ayanamsa चाहिए। पंचांग पन्नों पर इसके लिए Lahiri ayanamsa लिया जाता है। पर तिथि चंद्रमा और सूर्य के बीच का अंतर है। ayanamsa दोनों की स्थिति से बराबर घटता है, इसलिए घटाव में पूरी तरह कट जाता है। Lahiri लें, कोई दूसरा ayanamsa लें, या कोई ayanamsa न लें, तिथि और उसका अंत-समय वही रहता है।
करण भी इसी अंतर से बनता है। हर 6° पर एक करण होता है, यानी हर तिथि में दो करण। इसलिए करण पर भी ayanamsa का कोई असर नहीं पड़ता।
दूसरे पंचांग में तिथि का अंत एक मिनट अलग क्यों दिखता है?
बड़े पंचांगों से मिलाने पर तिथि के अंत का समय लगभग एक मिनट अलग मिल सकता है। यह अंतर ayanamsa का नहीं है, क्योंकि ऊपर बताए कारण से तिथि में ayanamsa कट जाता है। तिथि का हर अंत-समय जाँच में Swiss Ephemeris से मिलाया जाता है, और शर्त यह है कि अंतर 2 सेकंड से कम रहे। पन्ने पर यह समय सबसे नज़दीकी मिनट तक गोल करके छपता है। पूरी बात समय अलग क्यों आता है वाले पन्ने पर है।
व्यवहार में एक मिनट का फ़र्क़ तभी मायने रखता है जब तिथि ठीक सूर्योदय के आसपास बदले, क्योंकि सिर्फ़ तभी सूर्योदय वाली तिथि बदल सकती है। 2026 में दिल्ली के लिए ऐसा एक ही दिन है, 30 जून, जब तिथि बदलने का क्षण सूर्योदय से एक मिनट के भीतर पड़ता है।