पंचांगNow

पंचांग शब्दावली

तिथि से ayanamsa तक, पंचांग के शब्दों के छोटे और सटीक अर्थ

Panchang glossary · Tithi · Nakshatra · Yoga · Karana · Rahu Kaal · Choghadiya · Muhurat meaning

पंचांग का लगभग हर समय तीन चीज़ों से बनता है: शहर का सूर्योदय, शहर का सूर्यास्त, और आकाश में सूर्य और चंद्रमा की स्थिति। नीचे के ज़्यादातर शब्द इन्हीं से जुड़े हैं।

पंचांग के अंग

पंचांग (Panchang)

पंचांग का अर्थ है पाँच अंग: तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। किसी शहर में किसी दिन का पंचांग बताता है कि वहाँ सूर्योदय के समय ये पाँचों क्या थे, और तिथि, नक्षत्र, योग और करण कब तक चलेंगे। विस्तार से: पंचांग क्या है।

तिथि (Tithi)

चंद्रमा आकाश में सूर्य से जितना आगे होता है, उस कोण के हर 12 डिग्री पर एक तिथि पूरी होती है। एक चंद्र मास में 30 तिथियाँ होती हैं। तिथि की लंबाई तय नहीं है: 2026 में सबसे छोटी तिथि लगभग 20 घंटे की है और सबसे लंबी लगभग 27 घंटे की। इसलिए कभी एक ही तिथि लगातार दो सूर्योदयों पर रहती है, और कभी कोई तिथि किसी भी सूर्योदय पर नहीं पड़ती। 2026 में दिल्ली में 11 बार एक तिथि दो सूर्योदयों पर रहती है, और 17 तिथियाँ किसी सूर्योदय पर नहीं पड़तीं। "आज की तिथि" वह है जो सूर्योदय के समय चल रही थी। विस्तार से: तिथि कैसे गिनी जाती है।

नक्षत्र (Nakshatra)

राशिचक्र के 360 डिग्री को 27 बराबर भागों में बाँटा गया है, हर भाग 13°20′ का। चंद्रमा जिस भाग में होता है, वह उस समय का नक्षत्र है। यह चंद्रमा की sidereal स्थिति से गिना जाता है, इसलिए इस पर ayanamsa का असर पड़ता है। 2026 में एक नक्षत्र लगभग 21 से 27 घंटे तक रहता है। विस्तार से: नक्षत्र क्या है।

योग (Yoga)

सूर्य और चंद्रमा की sidereal स्थितियों को जोड़ा जाता है, और इस जोड़ के हर 13°20′ पर एक योग पूरा होता है। कुल 27 योग हैं, विष्कम्भ से वैधृति तक। 2026 में एक योग लगभग साढ़े 19 से 25 घंटे का है।

करण (Karana)

करण तिथि का आधा है: चंद्रमा और सूर्य के बीच के कोण के हर 6 डिग्री पर एक करण, यानी एक चंद्र मास में 60 करण। सात चर करण (बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि) इसी क्रम में बारी-बारी से आते हैं, और महीने में यह क्रम आठ बार पूरा होता है। चार स्थिर करण महीने में एक-एक बार आते हैं: शकुनि कृष्ण चतुर्दशी के दूसरे आधे में, चतुष्पाद और नाग अमावस्या के पहले और दूसरे आधे में, और किंस्तुघ्न शुक्ल प्रतिपदा के पहले आधे में। 2026 में एक करण लगभग 10 से साढ़े 13 घंटे का है, इसलिए एक दिन में अक्सर दो करण दिखते हैं।

वार (Vaar, Vara)

वार हफ़्ते का दिन है, पर पंचांग में यह सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक चलता है, आधी रात से नहीं। इसलिए रात 12 बजे के बाद और सूर्योदय से पहले का समय पिछले वार में ही गिना जाता है। हर वार का एक स्वामी ग्रह माना जाता है: रविवार का सूर्य, सोमवार का चंद्र, मंगलवार का मंगल, बुधवार का बुध, गुरुवार का गुरु, शुक्रवार का शुक्र और शनिवार का शनि। राहु काल, चौघड़िया और होरा, तीनों वार से तय होते हैं।

दिन, रात और मुहूर्त

सूर्योदय (Sunrise, Suryoday)

पंचांग का दिन सूर्योदय से शुरू होता है, और राहु काल, चौघड़िया, अभिजित जैसे ज़्यादातर समय इसी से गिने जाते हैं। सूर्योदय वह क्षण है जब सूर्य का ऊपरी किनारा क्षितिज पर दिखने लगता है। हर शहर का सूर्योदय अलग है, इसलिए हर शहर का पंचांग भी अलग है। गणना की ठीक परिभाषा नीचे "गणना के शब्द" में है।

सूर्यास्त (Sunset, Suryast)

वह क्षण जब सूर्य का ऊपरी किनारा क्षितिज से नीचे चला जाता है। पंचांग में सूर्यास्त उसी सूर्योदय के बाद वाला सूर्यास्त है। सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन है, और सूर्यास्त से अगले सूर्योदय तक रात।

चंद्रोदय और चंद्रास्त (Moonrise, Moonset)

चंद्रमा के उगने और डूबने का समय। गणना में अभी वह क्षण लिया जाता है जब चंद्रमा का केंद्र क्षितिज पर होता है (0 डिग्री)। चंद्रोदय का समय रोज़ खिसकता है, इसलिए यह कभी रात में, कभी सुबह और कभी दोपहर में पड़ता है। शहरों के पन्नों पर उस दिन के सूर्योदय के बाद और अगले सूर्योदय से पहले का पहला चंद्रोदय और चंद्रास्त छपता है; उस बीच चंद्रमा उगे या डूबे ही नहीं, तो — छपता है।

दिनमान (Dinman, Dinamana)

सूर्योदय से सूर्यास्त तक का कुल समय, यानी दिन की लंबाई। यह मौसम और शहर के साथ बदलता है: 2026 में दिल्ली का दिनमान लगभग 10 घंटे 19 मिनट से 13 घंटे 58 मिनट के बीच रहता है। राहु काल, दिन का चौघड़िया, अभिजित और दिन का होरा इसी को बराबर भागों में बाँटकर बनते हैं।

रात्रिमान (Ratriman, Ratrimana)

सूर्यास्त से अगले सूर्योदय तक का समय। रात का चौघड़िया, सायाह्न सन्ध्या और निशीथ मुहूर्त इसी रात से गिने जाते हैं। ब्रह्म मुहूर्त और प्रातः सन्ध्या अलग हैं: वे उस रात से गिने जाते हैं जो आज के सूर्योदय पर खत्म होती है।

मुहूर्त (Muhurta, Muhurat)

पंचांग की गणना में मुहूर्त समय की एक इकाई है। दिनमान का 15वाँ भाग दिन का एक मुहूर्त है, और रात्रिमान का 15वाँ भाग रात का एक मुहूर्त। 12 घंटे के दिन में एक मुहूर्त 48 मिनट का होता है; 2026 में दिल्ली में दिन का मुहूर्त लगभग 41 से 56 मिनट का रहता है। बोलचाल में किसी काम के लिए चुने गए शुभ समय को भी मुहूर्त कहा जाता है।

घटी, घटिका (Ghati, Ghatika)

समय की एक पारंपरिक इकाई। सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक 60 घटी होती हैं, इसलिए एक घटी लगभग 24 मिनट की होती है। बोलचाल में इसे घड़ी भी कहते हैं। वर्ज्य और अमृत काल में घटी का हिसाब अलग है: वहाँ एक घटी उस नक्षत्र की अपनी अवधि का 60वाँ भाग होती है।

होरा (Hora)

दिनमान के 12 बराबर भाग और रात्रिमान के 12 बराबर भाग, कुल 24 होरा। ये घड़ी के 60 मिनट वाले घंटे नहीं हैं। हर होरा एक ग्रह का माना जाता है, और ग्रह इस क्रम में आते हैं: सूर्य, शुक्र, बुध, चंद्र, शनि, गुरु, मंगल, फिर सूर्य। सूर्योदय पर पहला होरा उस वार के स्वामी का होता है। दिन और रात के होरा की लंबाई अलग होती है, और होरा ठीक 60 मिनट का तभी होता है जब दिन और रात दोनों ठीक 12-12 घंटे के हों। विस्तार से: होरा कैसे गिना जाता है।

अशुभ काल

परंपरा में कुछ समय नया काम शुरू करने के लिए ठीक नहीं माने जाते। पंचांग के पन्नों पर ये "अशुभ" निशान के साथ छपते हैं।

राहु काल (Rahu Kaal, Rahu Kalam)

सूर्योदय से सूर्यास्त तक के दिन को आठ बराबर भागों में बाँटा जाता है, और वार के हिसाब से उनमें से एक भाग राहु काल होता है; जैसे रविवार को आठवाँ भाग, जो सूर्यास्त पर खत्म होता है, और सोमवार को दूसरा। दिन छोटा-बड़ा होने से इसकी लंबाई भी बदलती है: 2026 में दिल्ली में लगभग 77 से 105 मिनट, और लंदन में लगभग 59 से 125 मिनट। विस्तार से: राहु काल कैसे गिना जाता है; आज का समय: दिल्ली का राहु काल।

यमगण्ड (Yamaganda, Yamagandam)

राहु काल की तरह यह भी दिन के आठ बराबर भागों में से एक है, जो वार से तय होता है; जैसे गुरुवार को पहला भाग, जो सूर्योदय से शुरू होता है। इसकी लंबाई उसी दिन के राहु काल के बराबर होती है।

गुलिक काल (Gulika Kaal, Gulikai Kalam)

यह भी दिन के आठ भागों में से वार से तय एक भाग है; जैसे शनिवार को पहला और रविवार को सातवाँ। किसी भी वार को राहु काल, यमगण्ड और गुलिक काल में से कोई दो एक ही भाग में नहीं पड़ते।

दुर्मुहूर्त (Dur Muhurtam, Durmuhurat)

वार के हिसाब से तय एक या दो मुहूर्त, ज़्यादातर दिन के 15 मुहूर्तों में से। रविवार और बुधवार को एक दुर्मुहूर्त होता है, बाकी पाँच वारों को दो। मंगलवार का दूसरा दुर्मुहूर्त रात में पड़ता है: सूर्यास्त के बाद वाली रात के 15 मुहूर्तों में सातवाँ। बुधवार का दुर्मुहूर्त दिन का आठवाँ मुहूर्त है, यानी वही समय जो बाकी दिनों में अभिजित मुहूर्त होता है।

वर्ज्य (Varjyam)

यह वार या सूर्योदय से नहीं, नक्षत्र से गिना जाता है। हर नक्षत्र के लिए एक तालिका में तय है कि नक्षत्र शुरू होने के कितनी घटी बाद वर्ज्य शुरू होगा, और वहाँ से यह 4 घटी तक रहता है। यहाँ एक घटी उसी नक्षत्र की अवधि का 60वाँ भाग है, इसलिए वर्ज्य की लंबाई नक्षत्र की लंबाई पर निर्भर है: 2026 में लगभग 84 से 109 मिनट। मूल नक्षत्र में वर्ज्य दो बार आता है। नक्षत्र हर जगह एक ही क्षण पर बदलता है, इसलिए वर्ज्य भी हर शहर में एक ही क्षण पर होता है; सिर्फ़ घड़ी का समय अलग दिखता है। शहरों के पन्नों पर उस दिन के सूर्योदय से अगले सूर्योदय के बीच पड़ने वाले सारे वर्ज्य छपते हैं।

शुभ मुहूर्त

परंपरा में ये समय शुभ माने जाते हैं, और पन्नों पर "शुभ" निशान के साथ छपते हैं। अमृत काल को छोड़कर ये सब सूर्योदय, सूर्यास्त और मुहूर्त की इकाई से बनते हैं।

ब्रह्म मुहूर्त (Brahma Muhurta, Brahma Muhurat)

जो रात आज के सूर्योदय पर खत्म होती है, उसके 15 मुहूर्तों में से आखिरी से पहला, यानी 14वाँ मुहूर्त। यह सूर्योदय से दो मुहूर्त पहले शुरू होकर एक मुहूर्त पहले खत्म होता है; 12 घंटे की रात में सूर्योदय से 96 मिनट पहले से 48 मिनट पहले तक। 2026 में दिल्ली में इसकी लंबाई लगभग 40 से 55 मिनट रहती है। विस्तार से: ब्रह्म मुहूर्त कब होता है।

प्रातः सन्ध्या (Pratah Sandhya)

सूर्योदय से डेढ़ मुहूर्त पहले से सूर्योदय तक का समय। मुहूर्त यहाँ भी उसी रात का है जो सूर्योदय पर खत्म होती है। इसलिए ब्रह्म मुहूर्त का आखिरी आधा हिस्सा प्रातः सन्ध्या में भी आता है।

अभिजित मुहूर्त (Abhijit Muhurat)

दिन के 15 मुहूर्तों में आठवाँ, यानी ठीक बीच वाला। इसका मध्य दिन के मध्य पर पड़ता है, जो सूर्योदय में आधा दिनमान जोड़ने से आता है; यह आमतौर पर घड़ी के ठीक 12 बजे नहीं होता। परंपरा में बुधवार को अभिजित नहीं माना जाता, इसलिए बुधवार को समय की जगह "आज नहीं" छपता है। विस्तार से: अभिजित मुहूर्त।

विजय मुहूर्त (Vijay Muhurat, Vijaya Muhurta)

दिन के 15 मुहूर्तों में 11वाँ, जो दिन के मध्य के बाद पड़ता है। इसकी लंबाई उस दिन के एक मुहूर्त के बराबर होती है।

सायाह्न सन्ध्या (Sayahna Sandhya)

सूर्यास्त से डेढ़ मुहूर्त बाद तक का समय, जहाँ मुहूर्त सूर्यास्त के बाद वाली रात का है। 12 घंटे की रात में यह सूर्यास्त के बाद 72 मिनट तक रहती है।

निशीथ मुहूर्त (Nishita Muhurta)

रात के 15 मुहूर्तों में आठवाँ, यानी रात का ठीक बीच वाला मुहूर्त। रात का मध्य सूर्यास्त में आधा रात्रिमान जोड़कर निकलता है, इसलिए निशीथ मुहूर्त का मध्य आमतौर पर घड़ी के ठीक 12 बजे नहीं होता।

अमृत काल (Amrit Kaal, Amrit Kalam)

वर्ज्य की तरह यह भी नक्षत्र से गिना जाता है। हर नक्षत्र के लिए तय है कि नक्षत्र शुरू होने के कितनी घटी बाद अमृत काल शुरू होगा, और यह 4 घटी तक रहता है, जहाँ घटी उसी नक्षत्र की अवधि का 60वाँ भाग है। हर नक्षत्र में एक अमृत काल होता है, और वर्ज्य की तरह यह भी हर शहर में एक ही क्षण पर पड़ता है।

चौघड़िया के सात नाम

चौघड़िया (Choghadiya, Chaughadia)

दिन (सूर्योदय से सूर्यास्त) के आठ बराबर भाग और रात (सूर्यास्त से अगले सूर्योदय) के आठ बराबर भाग। हर भाग का नाम सात नामों में से एक होता है। दिन में नाम इस क्रम में चलते हैं: उद्वेग, चर, लाभ, अमृत, काल, शुभ, रोग, फिर उद्वेग। रात में क्रम यह है: शुभ, अमृत, चर, रोग, काल, लाभ, उद्वेग, फिर शुभ। पहला नाम वार से तय होता है और आठवाँ भाग पहले नाम को दोहराता है, इसलिए हर दिन और हर रात में सातों नाम आते हैं। 2026 में दिल्ली में दिन का एक चौघड़िया लगभग 77 से 105 मिनट का रहता है। विस्तार से: चौघड़िया कैसे बनता है; आज का समय: दिल्ली का चौघड़िया।

परंपरा में अमृत, शुभ और लाभ को शुभ माना जाता है, चर को सम (न शुभ, न अशुभ), और उद्वेग, काल और रोग को अशुभ। पन्नों पर हर चौघड़िया के साथ यही निशान छपता है।

अमृत (Amrit)

शुभ माना जाने वाला चौघड़िया। सोमवार को दिन का पहला और आखिरी चौघड़िया अमृत होता है, और गुरुवार को रात का पहला और आखिरी। इसे अमृत काल से न मिलाएँ, जो नक्षत्र से गिना जाता है।

शुभ (Shubh)

शुभ माना जाने वाला चौघड़िया। गुरुवार को दिन का पहला और आखिरी चौघड़िया शुभ होता है, और रविवार को रात का पहला और आखिरी।

लाभ (Labh)

शुभ माना जाने वाला चौघड़िया। बुधवार को दिन का पहला और आखिरी चौघड़िया लाभ होता है, और शनिवार को रात का पहला और आखिरी।

चर (Char, Chal)

सम माना जाने वाला चौघड़िया, न शुभ न अशुभ। शुक्रवार को दिन का पहला और आखिरी चौघड़िया चर होता है, और सोमवार को रात का पहला और आखिरी।

उद्वेग (Udveg)

अशुभ माना जाने वाला चौघड़िया। रविवार को दिन का पहला और आखिरी चौघड़िया उद्वेग होता है, और बुधवार को रात का पहला और आखिरी।

काल (Kaal)

अशुभ माना जाने वाला चौघड़िया। शनिवार को दिन का पहला और आखिरी चौघड़िया काल होता है, और मंगलवार को रात का पहला और आखिरी। यह राहु काल से अलग है; दोनों अलग नियमों से गिने जाते हैं।

रोग (Rog)

अशुभ माना जाने वाला चौघड़िया। मंगलवार को दिन का पहला और आखिरी चौघड़िया रोग होता है, और शुक्रवार को रात का पहला और आखिरी।

मास, पक्ष और संवत्

पक्ष (Paksha)

चंद्र मास के दो आधे हिस्से, हर एक में 15 तिथियाँ। अमावस्या के बाद की प्रतिपदा से पूर्णिमा तक शुक्ल पक्ष होता है, जब चंद्रमा रोज़ बढ़ता दिखता है। पूर्णिमा के बाद की प्रतिपदा से अमावस्या तक कृष्ण पक्ष होता है, जब वह घटता है। इसीलिए तिथि के नाम के साथ पक्ष लिखा जाता है, जैसे शुक्ल तृतीया और कृष्ण तृतीया।

पूर्णिमा (Purnima)

30 तिथियों के क्रम में 15वीं, यानी शुक्ल पक्ष की आखिरी तिथि, जब चंद्रमा सूर्य से 168 से 180 डिग्री आगे होता है। 180 डिग्री का क्षण, यानी पूरा चाँद (full moon), इसी तिथि का अंत है।

अमावस्या (Amavasya)

30 तिथियों के क्रम में आखिरी, यानी 30वीं तिथि और कृष्ण पक्ष की 15वीं, जब चंद्रमा सूर्य से 348 से 360 डिग्री आगे होता है। 360 डिग्री का क्षण (new moon), जब सूर्य और चंद्रमा एक ही अंश (longitude) पर होते हैं, इस तिथि का अंत है; वहीं से अगली शुक्ल प्रतिपदा शुरू होती है।

मास (Maas, Masa)

चंद्र मास, यानी लगभग साढ़े 29 दिन का महीना। बारह मासों के नाम हैं: चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन। महीना कहाँ बदलता है, इसकी दो पद्धतियाँ हैं, अमांत और पूर्णिमांत; पन्ने पर मास के साथ लिखा रहता है कि कौन सी पद्धति है।

अमांत महीने का नाम उस अमावस्या से तय होता है जिससे वह शुरू हुआ: उस क्षण सूर्य जिस sidereal राशि में हो, उससे अगला नाम। जैसे अमावस्या पर सूर्य मीन में हो, तो चैत्र; सिंह में हो, तो भाद्रपद।

अधिक मास (Adhik Maas, Adhika Masa)

जिस चंद्र मास में सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में नहीं जाता, यानी कोई संक्रांति नहीं पड़ती, वह अधिक मास है। उसका नाम उसके बाद वाले महीने जैसा ही होता है, और आगे "अधिक" लगता है। 2026 में 16 मई से 15 जून तक अधिक ज्येष्ठ था; पन्नों पर ऐसे महीने के नाम के आगे "अधिक" छपता है।

अमांत (Amanta)

इस पद्धति में महीना अमावस्या पर खत्म होता है, और अगला महीना शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होता है। यह पश्चिमी और दक्षिणी भारत की परंपरा है। शहरों के पंचांग पन्नों पर मास के साथ "अमांत" लिखा रहता है।

पूर्णिमांत (Purnimanta)

इस पद्धति में महीना पूर्णिमा पर खत्म होता है, और यह उत्तर भारत में चलती है। शुक्ल पक्ष में दोनों पद्धतियों में मास का नाम एक ही रहता है, पर कृष्ण पक्ष में पूर्णिमांत का नाम एक आगे होता है। जैसे जो दिन अमांत में श्रावण कृष्ण पक्ष है, वही पूर्णिमांत में भाद्रपद कृष्ण पक्ष है।

ऋतु (Ritu)

साल की छह ऋतुएँ हैं: वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त और शिशिर। शहरों के पन्नों पर ऋतु सूर्योदय के समय सूर्य की sidereal राशि से छपती है, हर ऋतु दो राशियों की: मेष और वृषभ में वसन्त, मिथुन और कर्क में ग्रीष्म, सिंह और कन्या में वर्षा, तुला और वृश्चिक में शरद, धनु और मकर में हेमन्त, और कुम्भ और मीन में शिशिर। परंपरा में ऋतुओं को दो-दो चंद्र मासों से भी जोड़ा जाता है, जैसे वसन्त को चैत्र और वैशाख से। ऋतु गिनने के तरीके पंचांगों में एक जैसे नहीं हैं, इसलिए किसी दिन की ऋतु का नाम दूसरे पंचांग में अलग मिल सकता है।

अयन (Ayana)

साल के दो आधे हिस्से, उत्तरायण और दक्षिणायन। पंचांग के पन्नों पर उत्तरायण मकर संक्रांति से कर्क संक्रांति तक गिना जाता है, यानी जब सूर्य sidereal गणना में मकर से मिथुन तक की किसी राशि में हो; बाकी साल दक्षिणायन है। आकाश में सूर्य का उत्तर या दक्षिण की ओर मुड़ना, यानी अयनांत (solstice), आजकल इन संक्रांतियों से लगभग 24 से 25 दिन पहले होता है। यह अंतर ayanamsa के कारण है।

विक्रम संवत् (Vikram Samvat)

हिंदू पंचांगों में चलने वाला एक संवत्। विक्रम संवत् ईस्वी साल से 57 आगे चलता है, और साल के शुरुआती महीनों में 56 आगे। उत्तर भारत में नया विक्रम संवत् चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से गिना जाता है और गुजरात में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से। शहरों के पन्नों पर छपी संवत् संख्या चैत्र वाली गिनती है: वह चैत्र मास शुरू होने पर बदलती है।

शक संवत् (Shaka Samvat, Saka)

शक संवत् ईस्वी साल से 78 पीछे चलता है, और साल के शुरुआती महीनों में 79 पीछे। नया शक वर्ष चैत्र में लगता है, और शहरों के पन्नों पर इसकी संख्या भी चैत्र मास शुरू होने पर बदलती है। भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर भी शक संवत् पर चलता है।

चंद्र राशि (Chandra Rashi, Moon sign)

राशिचक्र के 30-30 डिग्री के 12 बराबर भागों को राशि कहते हैं: मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन। सूर्योदय के समय चंद्रमा sidereal गणना में जिस राशि में होता है, वह उस दिन की चंद्र राशि छपती है। चंद्रमा एक राशि में औसतन लगभग सवा दो दिन रहता है, इसलिए दिन के बीच में भी राशि बदल सकती है।

सूर्य राशि (Surya Rashi, Sun sign)

सूर्योदय के समय सूर्य जिस sidereal राशि में होता है। सूर्य एक राशि में लगभग एक महीना रहता है, और उसके नई राशि में जाने को संक्रांति कहते हैं। पश्चिमी (tropical) पद्धति की राशि से यह लगभग 24 डिग्री पीछे चलती है, इसलिए दोनों पद्धतियों में सूर्य की राशि का नाम ज़्यादातर दिनों में अलग आता है।

गणना के शब्द

अयनांश (Ayanamsa)

Tropical और sidereal राशिचक्र के शुरुआती बिंदुओं के बीच का कोण। Tropical स्थिति में से ayanamsa घटाने पर sidereal स्थिति मिलती है। 2026 में Lahiri ayanamsa लगभग 24.2 डिग्री है और हर साल लगभग 50 arcsecond बढ़ता है। नक्षत्र, योग और राशि पर इसका असर पड़ता है; तिथि और करण पर नहीं, क्योंकि चंद्रमा और सूर्य का अंतर लेने में यह कट जाता है। गणना में true ayanamsa (mean में nutation जोड़कर) घटाया जाता है, और शहर के पंचांग पन्ने पर उस दिन का mean मान छपता है।

लाहिरी अयनांश (Lahiri, Chitrapaksha)

Ayanamsa की वह परिभाषा जो भारत की Calendar Reform Committee ने तय की और जो राष्ट्रीय पंचांग में इस्तेमाल होती है। यहाँ इसका Swiss Ephemeris की SIDM_LAHIRI परिभाषा वाला रूप चलता है: 21 मार्च 1956 को 23°15′00.658″, nutation हटाकर, और आगे IAU 1976 की precession से बढ़ाया हुआ। पन्नों के सारे sidereal मान इसी से निकलते हैं।

निरयण (Sidereal, Nirayana)

तारों के सापेक्ष टिके राशिचक्र में नापी गई स्थिति। इसके उलट सायन (tropical) पद्धति वसंत विषुव (vernal equinox) से नापती है, और यह बिंदु तारों के बीच धीरे-धीरे खिसकता रहता है। दोनों का अंतर ही ayanamsa है। नक्षत्र, योग, चंद्र राशि और सूर्य राशि यहाँ निरयण गिने जाते हैं।

Ephemeris (एफ़ेमेरिस)

सूर्य, चंद्रमा और ग्रहों की किसी भी समय की स्थिति देने वाला खगोलीय डेटा। यहाँ NASA JPL की DE440s ephemeris इस्तेमाल होती है, जिसे Skyfield library पढ़ती है। इसकी अवधि 26 दिसंबर 1849 से 22 जनवरी 2150 तक है, और इसके बाहर की तारीख की गणना नहीं की जाती।

Swiss Ephemeris (स्विस एफ़ेमेरिस)

खगोलीय गणना का एक दूसरा स्रोत, जो यहाँ सिर्फ़ जाँच में चलता है। तिथि, नक्षत्र, योग और करण के अंत के समय और Lahiri ayanamsa इससे मिलाकर परखे जाते हैं। पन्नों पर छपा कोई भी समय इससे नहीं निकलता।

भूकेंद्रित (Geocentric)

पृथ्वी के केंद्र से देखी गई स्थिति। तिथि, नक्षत्र, योग और करण भूकेंद्रित स्थितियों से गिने जाते हैं, इसलिए ये पूरी पृथ्वी पर एक ही क्षण पर बदलते हैं; दिल्ली और न्यूयॉर्क में सिर्फ़ घड़ी का समय अलग दिखता है। पर सूर्योदय हर शहर में अलग है, इसलिए सूर्योदय के समय कौन सी तिथि थी, यह शहर के हिसाब से अलग हो सकता है। स्थितियाँ apparent हैं, यानी प्रकाश के समय, aberration और nutation सहित, और उसी दिन के true ecliptic में।

सूर्योदय की परिभाषा (Sunrise definition, −0.8333°)

गणना में सूर्योदय वह क्षण है जब सूर्य का केंद्र क्षितिज से 0.8333 डिग्री नीचे होता है। इस कोण में सूर्य के आधे व्यास और सामान्य वायुमंडलीय अपवर्तन, दोनों का हिसाब है, इसलिए इसी क्षण सूर्य का ऊपरी किनारा क्षितिज पर दिखता है। यह USNO और राष्ट्रीय पंचांग दोनों का मानक है। शहर की ऊँचाई (elevation) का सुधार नहीं लगाया जाता, और सूर्यास्त भी इसी परिभाषा से गिना जाता है।

समय क्षेत्र (Time zone)

हर शहर के समय उसी शहर की स्थानीय घड़ी में छपते हैं, IANA tzdata के नियमों से। भारत के सभी शहरों में यह IST (UTC+05:30) है। शहर के पन्ने के ऊपर उसका समय क्षेत्र और UTC से अंतर लिखा रहता है।

Daylight saving (DST)

कुछ देशों में साल के एक हिस्से में घड़ी एक घंटा आगे कर दी जाती है और बाद में वापस पीछे। यहाँ भारत के बाहर के ज़्यादातर शहरों में ऐसा होता है, जैसे लंदन, न्यूयॉर्क, टोरंटो और सिडनी; दुबई में नहीं। जिस रात घड़ी बदलती है, उस रात भी सारे भाग असल में बीते समय से गिने जाते हैं, घड़ी पर लिखे समय से नहीं।

समय का गोल होना (Rounding)

सारे समय सबसे पास वाले मिनट पर गोल करके छपते हैं, काटे नहीं जाते। 30 सेकंड या उससे ज़्यादा हों तो अगला मिनट छपता है: 6:00:50 का सूर्योदय 6:01 छपता है, और 6:00:29 का 6:00। किसी दूसरे स्रोत से मिलाते समय एक मिनट का अंतर इस वजह से भी आ सकता है।

हर नियम कहाँ से आया और कैसे जाँचा जाता है, यह गणना का तरीका पन्ने पर लिखा है। किसी दूसरे पंचांग से समय में छोटा अंतर दिखे, तो समय अलग क्यों आता है देखिए।

← सभी शहरों का पंचांग